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हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में कई चीजों की कमी है, पर वह मुख्य तत्व, जो सारे तंत्र की धुरी है, जो किसी भी तंत्र की सफलता एवं असफलता के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, वह है 'शिक्षक' ! मज़े की बात यह है की आज हमारे समाज के अधिकांश लोग, जिनमें कई अति-शिक्षित लोग भी शामिल हैं, शिक्षा का महत्व तो समझते हैं पर शिक्षकों का नहीं.

मुझे कई वर्ष पहले का एक वाक़या याद आता है.

मेरा पुराना मित्र हेमंत जैन विदेश से आया हुआ था और हम देश की शिक्षा की स्थिति की चर्चा कर रहे थे. समाजसेवा के दौरे हमें कभी-कभी पडा करते हैं, तो वैसे ही एक दौरे के अंतर्गत हम किसी सरकारी विद्यालय के पुनरूत्थान का प्रस्ताव लेकर कोटा के कलेक्टर के पास पहुंचे. पर्याप्त प्रतीक्षा के बाद सम्भव हुई जिलाधीश महोदय से बातचीत बड़े अच्छे माहौल में सम्पन्न हुई. उन्होंने हमारे विचारों को बड़ा प्रोत्साहित किया. उन्हें ऐसा लगा की हम किसी सरकारी स्कूल में अनुदान देना चाहते हैं. पर हमारा विचार था कि अनुदान तो भारत सरकार दे ही रही है, जिसके पास धन की (हमारी दृष्टि से) अनंत व्यवस्था है. हम तो वहां जाकर पढाने के मूड में थे.

निश्चित रूप से हम न तब खाली थे न अब ही हैं. हमें लगा कि हमारे जैसे शिक्षक मुफ्त पाकर सरकारी स्कूल को कृतकृत्य हो जाना चाहिए. पर जिलाधीश महोदय की दृष्टि में यह हमारे समय की बर्बादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं था. प्रथम तो उन्हें यह समझने में ही पर्याप्त समय लगा कि हम अनुदान देना नहीं, पढाना चाहते थे. जब पर्याप्त समझाने पर यह बात उनकी समझ में आ गयी तो उन्होंने छूटते ही कहा, "भई उसकी क्या ज़रूरत है? टीचर पढ़ायेंगे तो वही चीज़ें. ...."

इससे आगे मुझे स्पष्ट याद नहीं है, पर उस समय मन में हुई भयंकर प्रतिक्रिया अभी तक याद है. यदि एक ऐसा व्यक्ति, जो स्वयम् अत्यंत मेधावी छात्र रहा है, जिसने आई. ए. एस. जैसी परीक्षा उत्तीर्ण करी है, जो न अशिक्षित है न मूर्ख; उसके मन में भी यही भावना है कि शिक्षक एक ऐसी मशीन है जो विद्यार्थियों का पोर्शन पूरा कराती है, और सारे शिक्षक प्रायः एक जैसा काम ही करते हैं, शिक्षक के व्यक्तित्व का विद्यार्थी के जीवन में कोई महत्व नहीं है, तो अल्प शिक्षित जन सामान्य एवम् प्रयः अशिक्षित (अथवा अपशिक्षित) नेतागण यदि शिक्षकों का सम्मान न कर सकें तो उन्हें क्या कहें?

सच तो यह है कि शिक्षक का व्यक्तित्व, उसका आचार-व्यवहार, उसकी बोल-चाल का तरीका, उसके आदर्श- यह सब विद्यार्थी पर जीवन-पर्यंत पड़ने वाला असर डाल सकते हैं. अतः शिक्षक को बिल्कुल मेहनती, कर्मठ, ईमानदार, धैर्यवान, चरित्रवान एवं अपने विषय का ज्ञाता होना चाहिए. उसे सिगरेट, शराब, तम्बाकू, गुटका इत्यादि का कोई व्यसन नहीं होना चाहिए. जो अपेक्षाएं वह अपने विद्यार्थियों से कर रहा है, वह पहले उस कार्य को स्वयं कर सकने की स्थिति में हो. यही नहीं, शिक्षक वही बन सकता है जिसका मानसिक स्तर छात्रों से पर्याप्त ऊपर हो.

दुर्भाग्यवः, हमारे समाज में प्रायः वह व्यक्ति अध्यापक बनता है जिसे जीवन में और कुछ नहीं मिला, जो हर तरफ़ से लुट-पिट चुका है, ठुकराया जा चुका है. प्रोफेसरी तो फ़िर भी ठीक है, पर प्राइमरी/सैकेंडरी स्कूल के टीचर के स्तर से तो सभी परिचित हैं. जिसका जीवन स्वयं अभावों, कुंठाओं एवं विरोधाभासों का पुंज रहा है, वह अपने विद्यार्थियों को किस प्रकार सुखी, वैभवशाली एवं सामंजस्यपूर्ण जीवन के लिए तैयार कर पाएगा? जो स्वयं अपनी स्थिति एवं विषय से प्रेम नहीं करता, वह विद्यार्थी के मन में किस प्रकार अपने एवं अपने विषय के लिए आदर एवं उत्साह जगा पाएगा?