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यज्ञ, योग की विधि है जो परमात्मा द्वारा ही हृदय में सम्पन्न होती है। जीव के अपने सत्य परिचय जो परमात्मा का अभिन्न ज्ञान और अनुभव है, यज्ञ की पूर्णता है। यह शुद्ध होने की क्रिया है। इसका संबंध अग्नि से प्रतीक रूप में किया जाता है।

अधियज्ञोअहमेवात्र देहे देहभृताम वर ॥ 4/8 भगवत गीता

शरीर या देह के दासत्व को छोड़ देने का वरण या निश्चय करने वालों में, यज्ञ अर्थात जीव और आत्मा के योग की क्रिया या जीव का आत्मा में विलय, मुझ परमात्मा का कार्य है।

अनाश्रित: कर्म फलम कार्यम कर्म करोति य:|| स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: || 1/6 भगवत गीता

कर्म के किसी फल पर आश्रित होने की कोई आवश्यकता नहीं। एक यात्री के पग चिन्ह कहाँ जायेंगे? प्रकृति में किसी भी कार्य का कोई न कोई फल तो होगा ही। लेकिन उस यात्री को उन पगचिन्हों को गिनने की क्या आवश्यकता, जब लक्ष्य सामने हो। भय को त्याग और उत्साह के साथ, लक्ष्य को देखते हुये, प्रसन्नता के साथ, आत्म चिंतन का कार्य करना चाहिए। यही कार्य, यज्ञ है, कार्य करने वाला जीव, ही सन्यासी और वही योगी है। पाखंड और प्रपंच और अग्नि जला कर या अन्य तकनीक द्वारा योग के प्राप्ति की कोई विधि है ही नहीं?

यज्ञ की विधि क्या है? अग्नि को पावक कहते हैं क्योंकि यह अशुद्धि को दूर करती है। लोहे की असस्क को भीषण गर्मी में तपने के बाद, वह लोहा बन कर निकलता है। यह क्रिया भी लोहे का यज्ञ है। पारंपरिक विधि में यज्ञ की इस विधि को प्रतीकों से समझाया जाता रहा है। कुछ लोग उस अग्नि क्रिया को गलती से यज्ञ मान लेते हैं।कक


अग्नि में दूध के छींटे पडने से अग्नि बुझने लगती है। अग्नि और दूध के जल का यह प्रतीकात्मक प्रयोग सिर्फ यह ज्ञान देता है कि मनुष्य के अनियंत्रित विचार या अनुभव, संसार में अर्थहीन हैं और वह प्राकृतिक सिद्धांतों द्वारा नहीं फैल सकता । कोई भी अनुभव सर्व व्यापी नहीं होता। कोई व्यक्ति जो दुखी है वह अपने दुख के अनुभव को कैसे व्यक्त कर सकता है? और यदि वह अपनी बात कहता भी है या रोता बिलखता है, तो भी कोई दूसरा व्यक्ति उस दुख को नहीं समझ सकता।

दूध को मथने से उसका जल और घी अलग अलग हो जाते हैं। अब उसी अग्नि में घी डाला जाता है, जिस से अग्नि उसे प्रकाश में परिवर्तित कर देती है। । अग्नि और घी का यह प्रतीकात्मक प्रयोग सिर्फ यह ज्ञान देता है कि जब ज्ञान को उसी अग्नि रूपी सत्य में डाल दिया जाता है तब इस कर्म का प्रभाव अलग हो जाता है और अग्नि उस ज्ञान को संसार में प्रकाशित हो अंधकार को दूर करती है।

मुदिता मथइ, विचार मथानी । दम आधार, रज्जु सत्य सुबानी । तब मथ काढ़ि, लेइ नवनीता । बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥ 116.8 उत्तरकाण्ड

बिमल ज्ञान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छायी ॥ 121.6 उत्तरकांड

प्रसन्नता के साथ, सांसरिक विचारों को मथ कर उसे शुद्ध करने की क्रिया, इंद्रियों के संयम को खंबे की तरह खड़ा कर, सत्य और वाणी के रस्सी द्वारा की जाती है। दूध अर्थात संसार के विचार के इसी तरह मथने से घी निकाला जाता है, जिसमें मल अर्थात अशुद्धि नहीं होती, और उसमें उत्सर्ग या वैराग्य होता है, और वह सुंदर और पवित्र है। जो भी उस निर्मल या मल रहित, ज्ञान से स्नान करता है, उसके हृदय में श्री राम की भक्ति, अपने आप परिछायी की तरह आ जाती है।

दूध, घी और अग्नि और प्रकाश, क्रमशः अनुभव और ज्ञान और विवेक और सत्य हैं और यज्ञ उनका एक सामंजस्य है।

॥॥॥ भारतीय शास्त्रीय शिक्षा का एक विशेष गुण यह है कि गूढ शब्द और सिद्धान्त रुचिकर कथाओं या छंदों या भूगोल में प्रस्तुत किए जाते हैं जिन्हे आसानी से सीखा जा सकता है। जैसे ज्ञान को गंगा नदी की तरह कहा गया और यह ज्ञान वैसा है कि उसमें स्नान से पाप दूर होते हैं। इस तरह बिना सही अर्थ जाने भी उसका लौकिक प्रयोग भी लाभ्कारी और भारी पैमाने पर, रहस्य को प्रचारित करने में सहायक है। अंध विश्वास या कथाओं का सदउपयोगी प्रयोग कोई बुरा नहीं होता।

यज्ञ का अर्थ जबकि योग है किन्तु इसकी शिक्षा व्यवस्था में अग्नि और घी के प्रतीकात्मक प्रयोग में पारंपरिक रूचि का कारण अग्नि के भोजन बनाने में, या आयुर्वेद और औषधीय विज्ञान द्वारा वायु शोधन इस अग्नि से होने वाले धुओं के गुण को यज्ञ समझ इस 'यज्ञ' शब्द के प्रचार प्रसार में बहुत सहायक रहे।

हवन, वातावरण की शुद्धता के लिए औषधीय धुओं से जीवाणु रहित और, जो कचरे को सड़ कर मीथेन बना देते हैं, उनको जला कर उसके कार्बोन को आग बना उस शक्ति को ताप में बदल देती है। यद्यपि यह यज्ञ नहीं है किन्तु हवन के द्वारा वातावरण के कर्म कांड की उपयोगिता सरल है। ॥॥।

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यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म। [१] कुण्ड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट हवि पहुँचाने की प्रक्रिया को यज्ञ कहते हैं । हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करने के पश्चात इस पवित्र अग्नि में फल, शहद, घी, काष्ठ इत्यादि पदार्थों की आहुति प्रमुख होती है।

 [२]
  1. विकिपीडिया-यज्ञ | http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E
  2. विकिपीडिया-हवन | http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E