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प्राणायाम करते समय अथवा व्यायाम करते एवं खेलते समय जब विद्यार्थी श्वास को अन्दर भरते हैं एवं फेफड़ों पर जोर डालते हैं, तब अत्यंत आवश्यक है कि आरोग्यवर्धक एवं शुद्ध हवा उनके फेफड़ों में जाए. शरीर और मन को जोड़ने का तंतु है 'श्वास'. यदि श्वास के माध्यम से ली जाने वाली वायु ही अशुद्ध होगी तो हम विद्यार्थी के सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की कल्पना भी नहीं कर सकते. दुर्भाग्यवश, आजकल वातावरण में शहरों में प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि उनमें रहना कई चिमनियों के धुंए में रहने के जैसा है. यही कारण है कि अधिकाँश बच्चे बचपन से ही अस्थमा इत्यादि श्वास के रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं और जीवन भर दवाइयां खाने पर विवश हो जाते हैं. अब न तो हम शहर छोड़ कर सुदूर गावों में रह सकते हैं, न ही शहरों में वाहनों इत्यादि से होने वाला प्रदूषण रोक सकते हैं. तो अपने बच्चों को स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराने का क्या उपाय है?

इस स्थिति का एक अत्यंत सरल एवं सशक्त उपाय है- विद्यालय का शहर से दूर होना एवं विद्यालय में विद्यार्थियों द्वारा दैनिक यज्ञ कराया जाना. इस कार्य के लिए नवगुरुकुल में विद्यार्थियों द्वारा नियमित यज्ञ कराया जाना एवं उसके हेतु एक विस्तृत यज्ञशाला का विधिवत निर्माण आवश्यक है.

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