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पुस्तकालय किसी भी अकादमिक संस्थान का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है. किसी भी विद्यालय का स्तर न उसकी भव्य इमारत से तय होता है, न उसके सुन्दर कैम्पस से; बल्कि वह निर्धारित होता है उसके पुस्तकालय से.

'नवगुरुकुल' का पुस्तकालय विस्तृत होने के साथ-साथ कल्पनाशील एवं सुन्दर भी हो. यह एक ऐसा स्थान हो जहां न सिर्फ पुस्तकें रखी जाएँ, बल्कि छात्र सहज रूप से उन्हें वहीं बैठ कर पढ़ सकें. उनके पढ़ने का स्थान शांत, सुन्दर एवं सुविधाजनक होना अत्यंत आवश्यक है.

पुस्तकों का चयन एवं वर्गीकरण सावधानीपूर्वक किया जाए. पुस्तकें रोचक एवं ज्ञानवर्धक तो हों ही, विभिन्न स्तर के विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुए उनका विभिन्न स्तरों में वर्गीकरण भी अत्यंत आवश्यक है ताकि विद्यार्थी स्वयं पुस्तक खोजते हुए परेशान न हो जाये एवं उसे अपने स्तर के अनुकूल अच्छी पुस्तकें सहज ही उपलब्ध हो जाएँ. इस विषय में एक विद्यालय का पुस्तकालय एक कॉलेज/यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय से पर्याप्त भिन्न होगा जहां इस प्रकार पुस्तकों को अलग-अलग स्तरों में बाँट कर रखना आवश्यक नहीं होता.

छात्रों की रूचि बढाने के लिए श्रव्य-पुस्तकें (audio-books) भी रखी जा सकती हैं एवं उनको सुनने के लिए पुस्तकालय में ऑडियो-स्टेशन लगाए जा सकते हैं.

बदलते हुए समय को देखते हुए अधिकाधिक पुस्तकों की इलेक्ट्रौनिक कॉपी संस्थान के केन्द्रीय कम्प्यूटर पर उपलब्ध हों. इलेक्ट्रौनिक डेटा की अधिकता को देखते हुए पुस्तकालय में एक विशाल विभाग एल-सी-डी स्क्रीन वाले कम्प्यूटरों का भी हो, जिनपर ई-बुक्स एवं शैक्षणिक वीडियो उपलब्ध हों. यह विभाग विभिन्न अकादमिक विभागों के एवं छात्रावासों के कम्प्यूटरों से भी जुड़ा हो ताकि यह पुस्तकालय एक भवन की परिधि से निकल कर सभी और फैल जाए. अतिथि कक्ष सहित हर कक्ष में कुछ आवश्यक पुस्तकें तो होनी ही चाहियें.



विद्यार्थियों की दृष्टि सुरक्षित रहे, इस लिए त्रिफला के जल से नेत्रों को धोने, स्वच्छ रखने, नेत्र-योगाभ्यास करने की सुविधा भी पुस्तकालय का आवश्यक अंग हो.