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मन के विकास एवं मानसिक शक्तियों को तीक्ष्ण करने के लिए मौन एवं ध्यान का अभ्यास नितांत आवश्यक है. अतः एक ऐसा स्थान विद्यालय में अवश्य होना चाहिए जहां विद्यार्थी नियमित क्रम से सामूहिक रूप से बैठ कर मौन एवं ध्यान का अनुभव कर सकें. यही स्थान 'ध्यान-मंदिर' है.

ध्यान मंदिर एक ऐसा विशाल हॉल-नुमा स्थान हो जिसके केंद्र में सामूहिक सभा का स्थान हो, एवं उसके इर्द-गिर्द, कुछ हट कर, स्वाध्याय के लिए पुस्तकों के छोटे-छोटे रैक एवं बैठ कर पढने अथवा इच्छा होने पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान लगाने का स्थान हो. यज्ञशाला के संपर्क में ही (कुछ दूरी पर) एक स्वच्छ एवं हवादार स्थान पर 'ध्यान-मंदिर' का निर्माण विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभदायक रहेगा.

हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था न तो मौन का महत्त्व समझती है, न ही ध्यान का. वर्तमान में हममें से अधिकाँश किसी दूसरे व्यक्ति को यह स्वतंत्रता नहीं देना चाहते कि वह स्वयं के मन से बात-चीत कर सके, स्वयं के संपर्क में बैठ सके. हम इसे अपना अपमान भी मान बैठते हैं और दूसरे की असामाजिकता, उसका अहंकार अथवा उसकी मूर्खता भी. ऐसे में यह ध्यान-मंदिर एक ऐसा स्थान बने जहां मौन ही सामाजिक स्वीकृति हो. निरंतर मौन एवं ध्यान के अभ्यास से यह स्थान ऐसे स्पंदनों को अपने में समाहित कर ले जिनसे वहां प्रवेश करते ही हमारा मन अपने-आप ही शांत होता हुआ ध्यानस्थ हो जाए. ऐसा होगा नवगुरुकुल का ध्यान-मंदिर.

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