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छात्रों का निवास स्थान 'छात्रावास' कहलाता है. शहर के बाहर से पढ़ने के लिए आने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रावास आवश्यक हो जाता है. 'नवगुरुकुल' के छात्रावास के लिए निम्न बातें मुख्य हैं- (१) छात्रावास छोटे हों. १५-२० छात्र एक छात्रावास में रहें जिनके साथ एक अध्यापक भी सपरिवार रहें. यह एक प्रकार का 'गुरु-गृहवास' ही है. अध्यापक परिवार का चरित्र इतना उदार अवश्य हो कि वे छात्रों को शिष्य भाव से अपना सकें. उनके बीच की अनुशासन प्रेम एवं श्रद्धा का हो, न कि भय का. छात्रावास में सौहार्द का माहौल हो एवं प्रतिदिन कुछ नया सीखने एवं करने का उत्साह.

प्रायः देखा जाता है कि पुराने (अथवा बड़े) विद्यार्थी छोटे विद्यार्थियों को तंग करते हैं. अपने से कमजोर को दबाना एवं प्रताड़ित करना, पर-पीड़न से सुख का अनुभव करना इत्यादि आसुरी वृत्तियाँ हैं. मनुष्य के मूल स्वभाव में सभी वृत्तियाँ न्यूनाधिक मात्रा में रहती हैं एवं बच्चों में यह वृत्तियाँ अपने से बड़ों को देख कर प्रबल हो जाती हैं. इन वृत्तियों को 'मज़ाक' या 'ट्रेनिंग' कहकर नहीं टाला जा सकता. परिवार के सभी सदस्य राग के जिस तंतु से जुड़े रहते हैं, उसी अनुराग की भावना गुरु-परिवार के इन सदस्यों में विकसित हो.

छात्रों के रहने का स्थान हवादार हो, वहां सूर्य का पर्याप्त प्रकाश आता हो. सामने फल-फूलों का बागीचा हो जिसमें रूचि के अनुसार वे बागवानी भी कर सकें. छात्रावास सुन्दर एवं कलात्मक हों. वहां प्रवेश करते ही सुकून एवं आत्मीयता का एहसास हो. सम्पूर्ण छात्रावास वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार बनाया जाए.

विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए छात्रावास में एक अलग कक्ष भी हो जहां एक लघु-पुस्तकालय भी बनाया जा सकता है. वहां अन्तःजाल (intranet) से जुड़े हुए संगणक(कंप्यूटर) भी उपलब्ध हों.