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भारत की शिक्षा व्यवस्था पर अनेकानेक सिद्ध पुरुषों एवं मनीषियों ने विचार किया है. उनके आप्त वचनों से हमें दिशा भी मिलेगी और प्रेरणा भी. "शिक्षा नीति" अथवा "सैद्धांतिक चर्चा" के अर्न्तगत हम इन्ही विचारों की आलोक में अपनी दिशा तय करेंगे.

देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कुछ तत्व (जैसे वेशभूषा) बदलते रहते हैं, पर कुछ तत्त्व शाश्वत हैं (जैसे सत्य-भाषण एवं ब्रह्मचर्य). इस चर्चा से उन शाश्वत मूल्यों को हम पहचान सकेंगे जिनपर नवगुरुकुल की आधारशिला रखी गयी है.

काल के प्रवाह में कुछ भी शेष नहीं रहता. आज जिस कार्य को हम इतनी लगन एवं उत्साह से प्रारंभ कर रहे हैं, उसके परिणाम आने तक कई पीढियां बीत जायेंगी. यह यात्रा हमेशा निर्विघ्न चलती रहे, ऐसी सर्वमंगलमयी माँ से प्रार्थना है. पर यह सैद्धांतिक चर्चा विपरीत समय में हमारा मार्गदर्शन करेगी.

जब-जब नवगुरुकुल के संचालक कोई ऐसा निर्णय लेंगे जो इस सैद्धांतिक चर्चा के विपरीत हो, वह मान्य नहीं होगा. ऐसे समय में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का यह कर्त्तव्य होगा कि वे उसका विरोध करें एवं उसे निरस्त कराकर ही मानें. यही नहीं, यदि सारे विद्यार्थी एवं शिक्षक मिल कर भी कोई ऐसी मांग रख दें जो इस चर्चा के विपरीत हो, तो वह मांग स्वीकार्य नहीं होगी, भले ही संस्थान को बंद ही क्यों न कर देना पड़े. यह वचन आगे आने वाली पीढियां स्मरण रखेंगी, इसी विश्वास के साथ हम यह कार्य प्रारंभ कर रहे हैं.

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