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जब हम कुछ भी सीखना प्रारम्भ करते हैं तो निम्न चरणों से गुज़रते है:

विषय-प्रवेश अथवा परिचय Edit

सबसे पहले हम उस विषय के बारे में कुछ सूचना प्राप्त करते हैं - जैसे उसका नाम, उसके गुण या उसका महत्त्व. पर विद्यार्थी किसी भी विषय को ध्यान से तभी सुनता है जब उसकी उस विषय में रुचि जागृत हो जाये. आप याद करें, पौराणिक कथाओं में कथा के पहले उसका महात्म्य क्यों कहा जाता है? इसीलिये.

वर्तमान शिक्षा प्रणाली यह मानकर चलती है कि विद्यार्थी को पढ़ना तो पड़ेगा ही, हंसकर न सही तो रोकर सही. प्रायः उनमें परिचय या तो होते ही नहीं हैं, या इतने नीरस होते हैं कि उनका होना न होना बराबर है.

नवगुरुकुल में विषय-प्रवेश अथवा परिचय की संक्षिप्त परन्तु अति-महत्वपूर्ण भूमिका पर विशेष ध्यान दिया जाता है. एक बार रुचि के जागृत हो जाने पर विद्यार्थी क्या नहीं कर डालते!

विषय की प्रारम्भिक जानकारी Edit

एक बार किसी विषय को पढने की ठान ली, तो सबसे पहले उसके मुख्य बिंदु देखने पड़ते हैं. कैसी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग होता है? कौन कौन से नियम उसके अंतर्गत आते हैं? उसका विस्तार कहाँ तक है? उसकी सीमाएं क्या हैं? आदि आदि. यह वह सतही जानकारी है जो प्रायः याद करनी होती है.

वर्तमान शिक्षा प्रणाली प्रायः यहीं तक सीमित है. अनदेखे अनजाने विषय की यह सतही जानकारी ही विद्यार्थी को इतना बोझिल कर देती है कि अधिकाँश के लिए यह भी अगम्य हो जाता है. ध्यातव्य है कि सूचना-तकनीक के प्रसार के साथ इस रटी-रटाई जानकारी की प्रासंगिकता नगण्य हो जायेगी. सूचना प्राप्त करने के लिए अभी तो गूगल पर टाइप करना पड़ता है, बाद में बोल कर या सोच कर ही काम चल जायेगा. तब क्या करेंगे? और यह समय बहुत दूर नहीं है. यह आ चुका है.

नवगुरुकुल में हम समझते हैं कि कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ याद ही रखनी होती हैं. जैसे अपना नाम, देश का नाम, अपना पता आदि. परन्तु वे सारी अनावश्यक जानकारियाँ जो सहज ही गूगल से प्राप्त हो सकती हैं (जैसे ऐतिहासिक तारीखें, विश्व भर के देशों की राजधानियों एवं शहरों के नाम आदि), उन्हें हमने विद्यार्थी के रटने की लिस्ट से निकाल दिया है. सिर्फ वही परिभाषाएं और तथ्य याद रखने पर बल दिया जाता है, जिनकी जानकारी विषय के ज्ञान के लिए अनिवार्य है.

विषय का विश्लेषणात्मक अध्ययन Edit

मूल परिभाषा आदि प्रारम्भिक बातें सीखने के बाद बारी आती है उसे प्रयोग में लाने लायक समझ की. विद्यार्थी विभिन्न परिस्थितियों में पहचान सके कि यहाँ पूर्व में सीखे इन प्रारम्भिक तथ्यों को जोड़ने पर यह काम बन जायेगा. स्पष्ट है, यहाँ पहुँचने के लिए प्रारम्भिक ज्ञान आवश्यक है.

वर्तमान शिक्षा प्रणाली यहाँ तक आती तो है, पर उनके पठन-पाठन का तरीका प्रायः ऐसा होता है कि यह विभाग भी रटंत विद्या के नए शिखर स्थापित कर जाता है. कोर्स में अपवादस्वरूप दिए गए इस प्रकार के प्रश्नों का वर्गीकरण कर लिया जाता है. इनकी संख्या भी कम ही होती है-हद से हद चार-पांच. विद्यार्थियों को इन प्रश्नों को हल करने के तरीके घुटवा दिए जाते हैं. मूल भावना को दफ़न हुए तो अब पीढ़ियाँ गुज़र गईं!

नवगुरुकुल की पाठ्य-सामग्री में इस प्रकार के प्रश्नों का वर्ग ही अलग है. शिक्षक विद्यार्थी को प्रोत्साहित करते हैं कि वह स्वयं इन्हें हल करने का तरीका खोजे, न कि पूर्व में रटे हुए हल फिर से उगल दे. सीखना कुछेक प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहता. अभ्यास प्रश्न तो सिर्फ माध्यम हैं विश्लेषण की प्रक्रिया सीखने के. और प्रक्रिया सीख जाने के बाद दुनिया का उस विषय का कोई भी सवाल हल किया जा सकता है.

विषय का संश्लेषणात्मक अध्ययन Edit

यह ज़रा ऊपर की बात है. किसी एक बिंदु पर अर्जुन की तरह ध्यान केन्द्रित कर उसे सूक्ष्मता से देख पाना विश्लेषण की क्षमता है. इसके विपरीत और वृहत्तर है भिन्न प्रतीत होने वाले बिन्दुओं को कृष्ण की तरह ऐसे जोड़ देना कि वे एक वृहत्तर चित्र का हिस्सा बन जायें.

यदि दो (अथवा उससे अधिक, जैसे n) बिन्दु जोड़ने पर प्राप्त होने वाला निष्कर्ष उसके दोगुने (या n गुने) से अधिक मिल जाय, तो यह संश्लेषण का उदाहरण है.

कुछ उदाहरण दूंगा.

१. इतिहास पढ़ते समय हम अलग अलग सभ्यताओं द्वारा लिए गए निर्णयों की तुलना करें, उनके परिणामों की तुलना करें. अलग अलग सभ्यताओं की सोच को बदलने का क्रम देखें. उनके उत्थान-पतन से कर्म के सिद्धांत को समझें, तो इतिहास जीवंत हो उठेगा!

२. उस समय उपलब्ध तत्वों में से प्रत्येक का अध्ययन करने के बाद रूसी वैज्ञानिक मेंडलीफ़ को समग्रता में वह रासायनिक तत्वों की आवर्त सारिणी के रूप में दिखाई पड़ा.

विषय का शोधपरक स्वाध्ययन Edit

हिन्दी में एक कहावत है-लौ लगना. लगन लग जाना. जब कोई विषय विद्यार्थी के मन-मस्तिष्क पर छा जाय, वह कोर्स की तय मर्यादा से आगे जाकर भी उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहे, स्वाध्याय करना चाहे-तो वह इस श्रेणी में आता है.

कक्षा तीन के विद्यार्थी से आप मौलिक शोध की अपेक्षा नहीं कर सकते. पर उसके लिए तो अपने दांतों का निकलना भी एक शोध है. बारिश की बूंदों का गिरना, चींटियों का घर बनाना..संसार तो नया और चमत्कारी है. हम उसे शोध की प्रक्रिया सिखाते हैं, जिसके मुख्य चरण हैं:

प्रकृति को देखना

मन में उससे सम्बंधित जिज्ञासा का जन्म लेना

उसका उत्तर पाने के लिए मनन करना

संभावित उत्तर सोचना

उस उत्तर की सत्यता की जांच के लिए कुछ parameters तय करना

उन्हें देखना/नापना और व्यवस्थित ढंग से लिखना

फिर अपने निष्कर्ष निकालना.

ध्यान दें. महत्त्व प्रक्रिया का है, निष्कर्षों की सटीकता का नहीं. विद्यार्थी शोध की प्रक्रिया को आत्मसात करें, अपने निष्कर्ष खुद निकालने और कहने का साहस रखें . गलतियों से न डरें, न भागें. उनको पहचानें, उनसे सीखें और अपना विकास करते हुए आगे बढें.

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