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 कला केंद्र Edit

कला जीवन का उत्सव है, जीवन का उदात्त रूप है. मनुष्य में मनुष्यत्व के विकास और ईश्वर से साक्षात्कार का माध्यम है कला. कलाओं के अभाव में मनुष्य का जीवन एक निरंतर संघर्ष के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता. अतः कलाएं जीवन को अर्थ देतीं हैं, रस देती हैं, उसे जीने योग्य बनाती हैं.

आज अर्थ और काम की जिस अंधी दौड़ में हम आजीवन दौड़ने को अभिशप्त हैं, उनमें कलाओं की ओर भी माता-पिता की दृष्टि सिर्फ व्यावसायिक कोण से ही जाती है.

"क्या इससे कैरियर बनेगा?"

"कल जब बच्चा बड़ा होगा तो कमाएगा क्या?"

"वह स्टेज प्रोग्राम कब देने लगेगा?"

"क्या बच्चा 'इन्डियन आइडल' बन जाएगा?"

आदि आदि अनेक प्रश्न या तो उनके मन में उठते हैं, या वे पूछ ही डालते हैं.

कला के व्यवसायीकरण से हमें कोई आपत्ति नहीं है. आज के युग में अर्थ का महत्त्व इतना बढ़ गया है कि उसे छोड़ कर कला की एकान्तिक साधना भी अत्यंत कठिन है. पर हर सांस के साथ जोड़ने-घटाने का गणित, लाभ-हानि का कैलकुलेशन कला को इतना बोझिल कर देता है कि उसका आनंद भी चला जाता है और उसकी उदात्तता भी. यदि बालक गाना सीखे तो इसलिए नहीं कि माता-पिता उसे दस लोगों के सामने गवा कर उसकी नुमाइश कर सकें और कह सकें कि "देख! मेरा बेटा तो इन्डियन-आइडल बन गया"; बल्कि इसलिए कि उसे गाना अच्छा लगता है.

यह 'नवगुरुकुल' का दायित्व है कि वह छात्रों के लिए विभिन्न कलाओं के द्वार खोल दे. काबिल और समर्पित शिक्षकों के सान्निध्य में विद्यार्थी विभिन्न कलाओं का परिचय पाएं. यदि वे उनके प्रति आकर्षित होते हैं तो उनका अभ्यास प्रारम्भ करें. अक्सर विद्यार्थी का प्रारंभिक उत्साह कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है. इसमें कोई दोष नहीं है. विद्यार्थी को अपनी अभिरुचि एवं प्रतिभा को टटोलने का मौक़ा चाहिए ही सही. प्रारम्भिक अभ्यास के पश्चात् यदि विद्यार्थी उस कला के प्रति अधिक आकर्षण महसूस करता है तो वह उसे आगे सीख सकता है, और यदि उसका आकर्षण समाप्त अथवा क्षीण हो जाता है तो वह दूसरी कलाओं को आज़मा सकता है.

अतः 'नवगुरुकुल' में एक विस्तृत भवन कलाओं के विकास एव अभ्यास के लिए ही अपेक्षित है.