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ज्ञान योगेन संख्यानाम । कर्म योगेन योगिनाम ॥ भगवत गीता

सांख्य उसे कहते हैं जो असंख्य को शून्य तक लाये। इस विशेष ध्यान या कोन्सेंट्रेशन की क्रिया या बहुत सारे ज्ञान को शुद्ध कर जूस बना लेने या ‘एक’ तक सीमित करने को ही सांख्य या ज्ञान योग कहते हैं। संख्या या शाखाओं का बढ़ना, या अलग अलग सांसरिक विषय हैं जिसका कोई अंत नहीं होता। योग, जोड़ने को कहते हैं और यदि सभी संख्याओं को जोड़ दें तो वे एक संख्या बन जाती हैं। यही ‘जोड़ना’ ही योगियों का कर्म या कर्मों का उद्देश्य है। श्री कृष्ण यह कहते हैं, कि उनके मत में सांख्य (ज्ञान) और कर्म (क्रिया), दोनों ही एक ही हैं।

गोस्वामी जी ने कहा है, होई है जो सोई राम रचि राखा को करि तरक, बढ़ावहि साखा

कबीर की गिनती भी ढाई आखर प्रेम तक ही सीमित है।

श्री कृष्ण के लिए एक ही बहुत है। एकम इति अक्षरम। अक्षर एक है।

श्री राम, र और म से मिलकर शून्य की शांति हैं।

अंक परिचय


शून्य : शून्य अर्थात सूक्ष्मतम या शुद्धतम विचार ही सत्य है

एक : परमात्मा एक है जो अनंत अभिन्न शून्य अर्थात सत्य के द्वारा सभी प्राणियों में है। परब्रह्म, उस सत्य, जो एक बिन्दु है उसे बार बार प्रकट कर जीवों का निर्माण करता है। पेंसिल की नोक शून्य की तरह नुकीली है और पेंसिल एक है और कोई भी चित्र उस एक पेंसिल से बिन्दुओं द्वारा बनता है।

दो : जीव और परमात्मा दोनों को अलग अलग समझने का भ्रम ही द्वैत है, क्योंकि जीव, प्रकृति में परमात्मा का प्रतिबिंब है

तीन : जड़ प्रकृति के तीन गुण : सत गुण, रज गुण और तम गुण हैं

चार : जीव के चार स्वभाव या वर्ण या पुरुषार्थ होते हैं जो आत्मा को ढकने वाले प्रकृति के गुणों का घटता प्रभाव है। सूद्र – काम, वैश्य –अर्थ, क्षत्रिय – धर्म और ब्रह्म –मोक्ष

पाँच : पाँच ज्ञानेन्द्रिय नेत्र- दृश्य कर्ण- श्रवण, त्वचा-स्पर्श, जिह्वा-रस, नासिका-गंध पाँच भूत ; पृथ्वी, जल, अग्नि, ध्वनि की तरंगे, वायु

छह : पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण और ऊपर और नीची की छ्ह दिशाएँ

सात : प्रकाश के सात रंग ... बैगनी आसमानी नीला हरा पीला नारंगी लाल सप्ताह के सात दिन ... रवि, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि

आठ : प्रकृति के आठ अंग पाँच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार

नौ : श्री राम के द्वारा वर्णित नवधा या नौ प्रकार की भक्ति, 1। सत्संग 2। भगवत कथा मे रुचि 3। गुरु सेवा 4। निष्कपट कर्म 5। मंत्र या सिद्धांतो का स्मरण 6। शील 7। समता 8। संतुष्टि 9। सरलता


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